द्रविड़ देश का गौरव गीत “तमिळत्ताय वाल्‍त्त”

Ajay Singh Rawat/ October 30, 2024

तमिळनाड से एक नया विवाद इन दिनों सुर्खियों में है। अवसर था दूरदर्शन चेन्‍नै के स्‍वर्णजंयती समारोह और हिन्‍दी माह के समापन समारोह का सहआयोजन जहां तमिळ राज्‍यगान “तमिळत्ताय वालत्त” के गायन में द्रविड़ शब्‍द के उच्‍चारण में हुई चूक मुख्‍यमंत्री स्‍टालिन को बहुत नागवार गुजरी। सदा की तरह उनका कोपभाजन बने तमिळनाड के राज्‍यपाल रवीन्‍द्रनारायण रव‍ि, हिन्‍दी और आर्य। उस विवाद से तो सब अवगत हो चुके होंगे किन्‍तु जिस गीत को लेकर यह विवाद हुआ है उसकी पृष्‍ठभूमि और अर्थ को भी जान लेना अभी शेष है।
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यह गीत तमिळ विद्वान सुंदरम पिल्‍लै के लोकप्रिय नाटक ‘मनोन्‍मणीयम’ के आह्वान से लिया गया है। इसे कलिप्पा नामक एक संगीतमय छंद में रचा गया है।
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नीरारुम कडलुडुत्त निलमडन्‍दैक्‍केड़िलोड़ुगुम
लहराते समुद्र के वस्‍त्र से आवृत्त,
अवनि सुंदरी के सौंदर्य से छलकती हुई
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सीरारुम वदनमेनत्तिगळपरत्तक्‍कण्‍डमिदिल
भरतखण्‍ड रूपी दमकते सुंदर मुख वाली
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तेक्‍कणमुम अदिरचिरन्‍द द्राविड़नल तिरुनाडुम
दक्षिण भूमि उसमें भी सर्वश्रेष्‍ठ द्रविड़ साम्राज्‍य
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तक्‍कसिर पिरैनुदलुम तरित्तनरुम तिलकमुमे
जिसके गोल माथे पर सुगंधित तिलक की तरह सजा है
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अत्तिलक वासनैपोल अनैत्तुलगुम इन्‍बमुर
उस तिलक की सुंगध की भांति
सारे विश्‍व को आनंदित करने वाली
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एत्तिसैयुम पुगळमणक्‍क इरुन्‍द पेरुन्‍त्तमिळणंगे! तमिळणंगे!
अपनी कीर्ति तुम चारों दिशाओं में फैलाती आई हो, हे तमिळ सुन्‍दरी!
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उनसीरिलमैत्तिरमवियन्‍द सेयलमरन्‍द वाळत्तुदुमे! वाळत्तुदुमे!!
हम आश्‍चर्यपूर्वक तुम्‍हारे वैभव को निहारते हैं
और सब काम भूलकर तुम्‍हारी जयकार करते हैं
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पल्‍लुयिरुम पलवुलगुम पडैतलित्तुडैकिनुमोर
अनेक जीवन और अनेक सृष्‍टियों का सृजन और सफाया करने वाली
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एल्‍लयरु परम्पोरुलमुन इरन्‍दपड़ी इरुप्‍पदपोल
सर्वशक्‍तिमान तुम जैसी हो, वैसी ही बनी रहो
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कन्‍नड़मुम कलितेलुंगुम कविन्‍मलयालमुम तुलुवुम
कन्‍नड़ा, आनंदमयी तेलुगु, काव्‍यात्‍मक मलयालम, और तुलु भी
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उन्‍नुदरत्तेयुदित्ते ओन्‍रपल वागिडिनुम
भले ही परस्‍पर भिन्‍न हों किंतु तुम्‍हारी ही कोख से जन्‍मी हैं
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आरियम्‍पोल उलगवळक्‍कड़िनतोड़िन्‍दु सिदैयावुन
आर्यभाषा (संस्‍कृत) की भांति तुम सांसारिक गति से नष्‍ट नहीं हुई हो
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सीरिलमैत्तिरमवियन्‍द सेयलमरन्‍द वाळतुदुमे, वाळत्तुदुमे, वाळत्तुदुमे!!
हम आश्‍चर्यपूर्वक तुम्‍हारे वैभव को निहारते हैं
और सब काम भूलकर तुम्‍हारी जयकार करते हैं

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यह संपूर्ण मौलिक रचना है किन्‍तु तमिळ राज्‍यगान के लिए प्रथम छह पंक्‍तियों को ही लिया गया है। अन्‍यथा “आरियम्‍पोल उलगवळक्‍कड़िनतोड़िन्‍दु सिदैयावुन” में संस्‍कृत पर किए गये कटाक्ष को राजनीतिक औचित्‍य के गले की हड्डी बनते देर न लगती। कवि सुंदरम ने भले ही संस्‍कृत को मृतप्राय होने का उपालंभ दिया हो किंतु विडम्‍बना तो यह है कि उनके अपने नाम सहित इस कविता के अनेक शब्‍द संस्‍कृत से ही लिए गए हैं। जैसे कि नीर, वदन, भरतखण्‍ड, द्रविड़म्, तिलक,परम, उदर, और उदित। अस्‍तु, 1913 से करन्‍त्तै तमिळ संगम की मांग थी कि श्री सुंदरम पिल्‍लै रचित इस गीत को तमिळ मातृ वंदना के रुप में तमिळनाड का राज्‍यगान बनाया जाए। यह मांग अन्‍तत: 1970 में तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री करुणानिधि ने पूरी की।

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तमिळनाड के शिवगंगइ जिले के करइकुडि में सबसे प्राचीन तमिळत्ताय मंदिर है जिसका निर्माण 1975 में करवाया गया था। किसी भाषा या मातृभाषा को समर्पित यह विश्‍व का एकमात्र मंदिर है। जब तमिळत्ताय या तमिल माता की मूर्ति प्रतिष्‍ठित करने की योजना बनी तो स्‍थपति ने इसके लिए प्रसिद्ध गंगैकोण्‍ड चोळापुरम मंदिर में स्‍थित ज्ञान सरस्‍वती के स्‍वरूप को चुना। किंतु उग्र और आक्रामक तेवर वाले कतिपय द्रविड़ों को कदाचित् यह उज्‍जवल और सौम्‍य स्‍वरूप रास नहीं आया। उनकी कल्‍पना साकार हुई संतोष नारायणनन के बनाए चित्र में जो युद्ध की देवी कोट्रवै से प्रेरित है और जिसका त्रिशूल है तमिळ का अद्वितीय माना जाने वाला वर्ण ழ। हालांकि हिन्‍दी और दूसरी भारतीय भाषाओं में प्रयुक्‍त होने वाला ळ इसके अत्‍यंत समीप है किन्‍तु मानक हिन्‍दी में इसकी उपेक्षा और भाषाई द्वंद्व के चलते यह बात उभरकर आ नहीं पाती है।
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तमिळत्ताय के दो रूप
तमिळत्ताय

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तमिळनाड में प्रत्‍येक सरकारी कार्यक्रम 54 वर्ष पूर्व रचे गए तमिळत्ताय वाल्‍त्त गीत से प्रारंभ होता है और राष्‍ट्रगान से समाप्‍त होता है। राष्‍ट्रगान की भांति ही इसे गाए जाते समय भी उपस्‍थित जनों का खड़े रहना अनिवार्य है।
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तमिळनाड अकेला भारतीय राज्‍य नहीं है जिसका कोई राज्‍यगान है अपितु वर्तमान में 12 राज्‍यों के अपने राज्‍यगान है। यह राज्‍य हैं असम, आन्‍ध्रप्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, कर्णाटक, मध्‍यप्रदेश, मणिपुर, ओडिशा, पुदुशेरी, तमिळनाड और उत्तराखण्‍ड। केन्‍द्र शासित प्रदेश पुदुचेरी की राजभाषा भी तमिळ है। वहां के राज्‍यगान में भी तमिळत्ताय की वंदना की जाती है किंतु वह प्रसिद्ध कवि भारतीदासन की रचना “वाल्‍विनिल सेम्‍मयै“ है।

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अंत में यह बताना भी आवश्‍यक है कि इस विवाद में श्री आर. एन. रवि की कोई भूमिका नहीं थी और यह तकनीकी कारणों से हुई एक चूक ही थी।
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शब्दावली: “नीरारुम कडलुडुत्त” में भूमि प्रणाम श्‍लोक के “समुद्रवसने देवि” की अनुगूंज स्‍पष्‍ट सुनाई देती है। तमिळ का ‘वाल्‍त्तुदुमे’ शब्द संस्कृत के ‘वंदे’ शब्द के समतुल्य है। यद्यपि यह आधुनिक तमिल में एक सामान्‍य शब्द बन चुका है किंतु प्राचीन तमिल साहित्य में देवताओं के लिए यह प्रयुक्‍त होता रहा है। “तेक्‍कणम” संस्‍कृत के “दक्षिण” शब्‍द का ही तमिळ रूप है। तेक्‍कण से ही अंगरेज़ी का “डेक्‍कन” भी बना है। आज भले ही भारत को “भारत” कहना किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा से जोड़कर देखा जाए किन्‍तु “भरतखण्‍ड” शब्‍द का उल्‍लेख पुराणों में भी हुआ है।